पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। राज्य की उन 115 सीटों पर जहाँ मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 30% से अधिक है, वहाँ टीएमसी ने अपना प्रभुत्व तो बनाए रखा है, लेकिन भाजपा ने पिछली बार की तुलना में जबरदस्त बढ़त हासिल की है।
1. 115 निर्णायक सीटों का मुख्य गणित
इन सीटों को बंगाल की सत्ता की ‘चाभी’ माना जाता है। यहाँ का चुनावी परिणाम द्विध्रुवीय (Bipolar) राजनीति की पुष्टि करता है:
- तृणमूल कांग्रेस (TMC): 115 में से 69 सीटों पर जीत/बढ़त। (पिछली बार 85 में से 75 सीटें जीती थीं, जो इस बार के अनुपात में भारी गिरावट है)।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP): इन क्षेत्रों में परंपरागत आधार न होने के बावजूद 39 सीटें जीतीं। यह भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
- अन्य दल: कांग्रेस (3), एजेयूपी (2), सीपीएम (1) और एआईएसएफ (1) सीट पर सिमट गए हैं।
2. जिलावार प्रदर्शन की स्थिति (30%+ मुस्लिम आबादी वाली सीटें)
| जिला | कुल मुख्य सीटें | टीएमसी (बढ़त/जीत) | भाजपा (बढ़त/जीत) | अन्य |
|---|---|---|---|---|
| मुर्शिदाबाद | 22 | 09 | 08 | 05 (कांग्रेस, एजेयूपी, सीपीएम) |
| दक्षिण 24 परगना | 20 | 17 | 01 | 02 (कांग्रेस, एआईएसएफ) |
| उत्तर 24 परगना | 11 | 09 | 02 | – |
| मालदा | 09 | 06 | 03 | – |
| उत्तर दिनाजपुर | 09 | 05 | 04 | – |
| बीरभूम | 10 | 05 | 05 | – |
| हावड़ा | 11 | 08 | 03 | – |
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3. प्रमुख सीटों के चौंकाने वाले परिणाम
- नंदीग्राम: शुभेंदु अधिकारी (BJP) ने ममता बनर्जी को हराकर अपनी पकड़ साबित की। यहाँ 30% मुस्लिम आबादी के बावजूद भाजपा की जीत ध्रुवीकरण की ओर इशारा करती है।
- बर्धमान (पूर्व): यहाँ की 7 अल्पसंख्यक बहुल सीटों में से 6 पर भाजपा ने कब्जा कर सबको चौंका दिया है।
- भांगर: यहाँ एआईएसएफ (AISF) ने अपनी एक सीट बचाए रखने में कामयाबी हासिल की है।
4. ‘किंगमेकर’ शुभेंदु अधिकारी का असर
कभी ममता बनर्जी के रणनीतिकार रहे शुभेंदु अधिकारी अब भाजपा के लिए ‘सत्ता की चाभी’ बनकर उभरे हैं। उन्होंने न केवल नंदीग्राम में ममता बनर्जी को मात दी, बल्कि उन क्षेत्रों में भी भाजपा का कमल खिलाया जहाँ टीएमसी का एकछत्र राज था। उनके नेतृत्व में भाजपा ने अल्पसंख्यक प्रभाव वाली 39 सीटें जीतकर टीएमसी के अपराजेय होने के भ्रम को तोड़ दिया है।
5. क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस का सफाया
- कांग्रेस और वामदल: जो कभी इन क्षेत्रों के ‘सुल्तान’ हुआ करते थे, वे अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे कांग्रेस के गढ़ ढह गए हैं।
- ओवैसी और हुमायूँ कबीर फैक्टर: जानकारों का मानना है कि एजेयूपी और अन्य छोटे दलों ने टीएमसी के वोटों में सेंध लगाई, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।

