संपादकीय

भारत की सबसे प्रतिष्ठित और संवेदनशील परीक्षाओं में से एक नीट (NEET-UG) को लेकर हाल के वर्षों में उपजे विवादों और पेपर लीक की घटनाओं ने देश की संपूर्ण परीक्षा प्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। लाखों छात्र सालों-साल दिन-रात एक करके, अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई कोचिंग संस्थानों में झोंककर इस परीक्षा की तैयारी करते हैं। लेकिन जब परीक्षा के ठीक बाद पेपर लीक, धांधली या अस्वाभाविक रूप से बड़ी संख्या में टॉपर्स आने की खबरें हेडलाइंस बनती हैं, तो वह सिर्फ एक परीक्षा की नाकामी नहीं होती, बल्कि देश के लाखों युवाओं के भरोसे की हत्या होती है। यह संकट साफ तौर पर इशारा करता है कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों, प्रिंटिंग प्रेसों और कुछ भ्रष्ट कोचिंग सेंटरों के बीच एक गहरा और संगठित नेटवर्क काम कर रहा है, जिसने देश की योग्यता-आधारित व्यवस्था की रीढ़ पर प्रहार किया है। चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे में प्रवेश के स्तर पर ही अगर भ्रष्टाचार सेंध लगा दे, तो इसके परिणाम पूरे समाज के लिए दूरगामी और भयानक हो सकते हैं।
परीक्षा प्रणाली में आमूल-चूल सुधार और जवाबदेही की आवश्यकता
इस राष्ट्रीय संकट से उबरने और चिकित्सा प्रवेश परीक्षा की गरिमा बहाल करने के लिए अब महज़ जांच समितियों के गठन और लीपापोती से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसके लिए व्यापक प्रशासनिक और तकनीकी बदलावों की दरकार है। अब पारंपरिक पेन-पेपर मोड की जगह पूरी तरह से सुरक्षित कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट को अपनाना और एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्रों का इस्तेमाल करना समय की मांग है, जो परीक्षा शुरू होने से ठीक कुछ मिनट पहले ही डिजिटल रूप से परीक्षा केंद्रों पर सक्रिय हों। इसके साथ ही, सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम के तहत पेपर लीक में शामिल अपराधियों और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ फास्ट-ट्रैक कोर्ट के ज़रिए न्यूनतम दस साल की जेल और संपत्ति ज़ब्त करने जैसी सख्त कानूनी कार्रवाई को ज़मीन पर उतारना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी राष्ट्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ होते हैं और जब तक हम अपने युवाओं को एक पारदर्शी, सुरक्षित और निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली का भरोसा नहीं देते, तब तक एक न्यायपूर्ण समाज और विकसित राष्ट्र बनने की हमारी कल्पना अधूरी ही रहेगी।

