भारत मंडपम में एससी, एसटी व ओबीसी एडवोकेट्स सम्मेलन को किया संबोधित, डॉ. आंबेडकर की कानूनी विरासत को किया नमन
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि देश का संविधान एक ‘निरंतर जिम्मेदारी’ है, जिसके उच्च आदर्शों को जीवंत बनाए रखने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपे जाने वाली सतत प्रक्रिया है। मुख्य न्यायाधीश राजधानी के भारत मंडपम में एससी, एसटी और ओबीसी एडवोकेट्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। यह महत्वपूर्ण सम्मेलन ‘भारत रत्न डॉ. बी. आर. आंबेडकर के जीवन, संघर्ष और सांविधानिक विरासत’ विषय पर केंद्रित था।
मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में संविधान निर्माता डॉ. बी. आर. आंबेडकर को भारत का महान सपूत करार देते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब असाधारण ज्ञान के धनी विद्वान और अटूट साहस वाले महान समाज सुधारक थे, जिन्होंने वंचितों और शोषितों के हक के लिए अपने अनेक ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण संघर्ष कानून के दायरे में रहकर लड़े। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रेखांकित किया कि उन अनवरत संघर्षों का सबसे स्थायी और गौरवशाली प्रतिफल भारत का संविधान है।
सीजेआई ने कहा कि यद्यपि संविधान का औपचारिक पाठ दशकों पहले पूर्ण हो चुका है, लेकिन उसके मूलभूत मूल्यों, समानता और न्याय के आदर्शों को समाज के हर स्तर पर जीवंत बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने स्मरण कराया कि स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनने से बहुत पहले बाबा साहेब एक कुशल व समर्पित वकील थे, जो न्याय मिलने में होने वाली देरी और कानूनी प्रक्रियाओं के वास्तविक महत्व को भली-भांति समझते थे।
मुख्य न्यायाधीश ने शिक्षा के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि डॉ. आंबेडकर शिक्षा को मानवीय स्वतंत्रता और सशक्तीकरण का प्राथमिक माध्यम मानते थे। शिक्षा ही वह साधन है जो नागरिकों को आजीविका कमाने, सार्वजनिक जीवन में मुखर होकर अपनी आवाज उठाने और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर दावा करने का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब ने हमेशा कानूनी अधिकारों के प्रभावी संरक्षण पर सर्वाधिक बल दिया।
अपने संबोधन के अंत में सीजेआई ने संविधान के अनुच्छेद 32 का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आंबेडकर ने गहरी दूरदर्शिता के साथ उस प्रावधान का समर्थन किया था, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अधिकार को ही एक मौलिक अधिकार बनाता है। यही कारण था कि बाबा साहेब ने संविधान सभा में इस ऐतिहासिक प्रावधान को पूरे ‘संविधान की आत्मा और हृदय’ की संज्ञा दी थी।

