‘जिला बदर करने से आजादी के अधिकार पर पड़ता है सीधा असर’, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ का फैसला
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नागरिक स्वतंत्रता को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को जिला बदर (Externment) करने से उसके मौलिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसलिए बिना किसी अत्यंत ठोस और पुख्ता कानूनी आधार के किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने इस सख्त टिप्पणी के साथ छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति के खिलाफ नवंबर 2025 में जारी किए गए जिला बदर के प्रशासनिक आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया।
रायगढ़ और सीमावर्ती जिलों से बाहर रहने का था आदेश प्रशासनिक आदेश के तहत संबंधित व्यक्ति को पूरे एक वर्ष की अवधि के लिए छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले तथा उससे सटे पड़ोसी जिलों की सीमाओं से बाहर रहने का फरमान सुनाया गया था। इस कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पाया कि आदेश जारी करते समय पर्याप्त और ठोस तथ्यों का अभाव था।
‘ठोस कारणों के अभाव में कमजोर है आदेश’ खंडपीठ ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि जिला बदर का आदेश पारित करते समय कानून के तहत तय अनिवार्य प्रक्रिया और ठोस कारणों का पालन नहीं किया गया। पीठ ने कहा कि पर्याप्त साक्ष्य और ठोस कारणों के बिना दिया गया ऐसा आदेश कानूनी रूप से कमजोर है और कानून के समक्ष टिकने योग्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासन द्वारा नागरिकों की बुनियादी आवाजाही की स्वतंत्रता को मनमाने तरीके से सीमित नहीं किया जा सकता।

