वित्त संबंधी स्थायी समिति की सिफारिशों पर चर्चा, अमेरिकी दबाव के आरोपों को मंत्रियों ने बताया बेबुनियाद
नई दिल्ली: देश में 2,000 रुपये से अधिक के एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) आधारित शुल्क व्यवस्था लागू करने की संभावनाओं को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस संभावित कदम पर तीखा विरोध दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने यह निर्णय अमेरिकी दबाव में लिया है। दूसरी तरफ, संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की हालिया सिफारिशें भी इस चर्चा के केंद्र में आ गई हैं, जिसमें डिजिटल भुगतान तंत्र की वित्तीय स्थिरता के लिए चरणबद्ध राजस्व मॉडल की वकालत की गई थी।
स्थायी समिति की रिपोर्ट में क्या थीं प्रमुख सिफारिशें? संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि यूपीआई प्रणाली को अनिश्चितकाल तक पूरी तरह से सरकारी खजाने की सब्सिडी पर निर्भर रखना व्यावहारिक और वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है। समिति ने 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर एक निश्चित दर से चरणबद्ध एमडीआर व्यवस्था अधिसूचित करने की सिफारिश की थी। रिपोर्ट में आगाह किया गया था कि राजस्व मॉडल में देरी से भुगतान सेवा प्रदाताओं की कार्यक्षमता, साइबर सुरक्षा और वित्तीय धोखाधड़ी रोकने के तकनीकी निवेश पर गंभीर असर पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि 12 अगस्त को जब यह रिपोर्ट स्वीकार की गई, तब समिति में पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी और गौरव गोगोई सहित कांग्रेस के पांच सांसद मौजूद थे और उस समय कोई आधिकारिक असहमति दर्ज नहीं कराई गई थी।
अमेरिकी दबाव के आरोपों को सरकार ने नकारा राहुल गांधी के आरोपों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने अमेरिकी दबाव के दावे को पूरी तरह निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्य नागरिकों और छोटे खुदरा व्यापारियों पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। वहीं, भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर जनता के बीच अकारण भ्रम और भय फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था की सुरक्षा और मजबूती के लिए सभी पहलुओं पर संतुलित विचार किया जा रहा है।

