सूरत: गुजरात के डायमंड सिटी सूरत से एक बेहद हैरान करने वाला और गंभीर प्रशासनिक मामला सामने आया है। सूरत के वेड दरवाजा क्षेत्र स्थित नासिरनगर झुग्गी बस्ती में करीब 80 से अधिक रिहायशी मकानों को बुलडोजर से गिराए जाने की घटना के 10 दिन से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि आखिर इस बड़ी कार्रवाई को किसने अंजाम दिया। सूरत नगर निगम (SMC) ने इस पूरे विध्वंस अभियान में अपनी किसी भी तरह की भूमिका या संलिप्तता से साफ इनकार कर दिया है। दूसरी तरफ, रातों-रात बेघर हुए पीड़ित स्थानीय निवासियों ने इस अमानवीय कार्रवाई को पूरी तरह अवैध बताते हुए न्याय के लिए गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
नगर आयुक्त ने दिए जांच के आदेश; उपमहापौर बोले— दोषियों को बख्शेंगे नहीं
मामले के तूल पकड़ने के बाद सूरत नगर निगम (एसएमसी) बैकफुट पर है और उसने इस रहस्यमयी तोड़फोड़ की आंतरिक जांच के कड़े आदेश जारी किए हैं। एसएमसी के उपमहापौर सुधाकर चौधरी ने मंगलवार (9 जून 2026) को मीडिया से बात करते हुए कहा, “नगर आयुक्त एन. नागराजन ने 30 मई को नासिरनगर झुग्गी बस्ती में की गई अचानक तोड़फोड़ की घटना की उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं। हमने इस संवेदनशील मुद्दे पर आयुक्त के साथ औपचारिक समीक्षा बैठक की है। उन्होंने पूरा आश्वासन दिया है कि इस अवैध कृत्य में शामिल किसी भी दोषी अधिकारी या बाहरी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी।”
‘हमारे अधिकारी सड़क सीमांकन के लिए गए थे, तोड़फोड़ किसने की पता नहीं’: राजन पटेल
एसएमसी (SMC) की स्थायी समिति के अध्यक्ष राजन पटेल ने एक अजीबोगरीब दावा करते हुए कहा कि नगर निगम प्रशासन को इस व्यापक तोड़फोड़ की भनक तक नहीं थी और उन्हें इसकी जानकारी मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से मिली। पटेल ने कहा, “हमारी प्राथमिक और शुरुआती जांच में यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि मकानों को गिराने में निगम का कोई आधिकारिक आदेश या भूमिका नहीं थी। हां, यह सच है कि उस दिन (30 मई) हमारे कुछ तकनीकी अधिकारी पुलिस सुरक्षा के बीच केवल उस क्षेत्र में सड़क के सीमांकन (Demarcation) के लिए गए थे। लेकिन सीमांकन के दौरान वहां तोड़फोड़ किसने और किसके आदेश पर शुरू की, यह गहन जांच का विषय है।”
अंधाधुंध कार्रवाई: 1 घंटे का समय दिया, 40 साल पुराने 84 मकान किए जमींदोज
कांग्रेस नेता और क्षेत्र के पूर्व पार्षद असलम साइकिलवाला ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर नगर निगम और पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लिया है। साइकिलवाला ने राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) का हवाला देते हुए बताया कि यह विवादित जमीन आंशिक रूप से एसएमसी की है और आंशिक रूप से एक पारसी परिवार की है।
उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “नासिरनगर झुग्गी बस्ती में मौजूद कुल 111 पक्के मकानों में से 84 मकानों को 30 मई को पूरी तरह मटियामेट कर दिया गया। ये मकान कोई रातों-रात नहीं बने थे, बल्कि 40 से 50 वर्ष पुराने थे और इनके मालिक बकायदा हर साल एसएमसी को संपत्ति कर (Property Tax) का भुगतान कर रहे थे। तोड़फोड़ शुरू करने से ठीक पहले लाचार गरीबों को अपना सामान निकालने के लिए महज एक घंटे का समय दिया गया और उनके आशियाने उजाड़ दिए गए।”
बिल्डर-पुलिस-अधिकारी नेक्सस का आरोप; FIR लेने से पुलिस का इनकार
पूर्व पार्षद असलम साइकिलवाला ने सत्तारूढ़ भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए सीधे आरोप लगाया, “यह पूरी अवैध कार्रवाई बिना किसी कानूनी प्रक्रिया या नोटिस के, भाजपा से जुड़े एक रसूखदार बिल्डर को फायदा पहुंचाने के लिए की गई है, जिसकी नजर इस कीमती जमीन पर एक बड़ी निजी परियोजना लाने की है। इसमें भ्रष्ट अधिकारी और पुलिस पूरी तरह मिले हुए हैं।” उन्होंने प्रशासन के दोहरे रवैए को उजागर करते हुए कहा कि जब पीड़ित लोग इस तोड़फोड़ के खिलाफ अज्ञात लोगों पर एफआईआर (FIR) दर्ज कराने स्थानीय पुलिस स्टेशन गए, तो पुलिस ने यह कहते हुए शिकायत लेने से साफ मना कर दिया कि यह कार्रवाई खुद एसएमसी ने की है। वहीं दूसरी तरफ एसएमसी इससे पल्ला झाड़ रही है, जबकि चश्मदीदों के मुताबिक तोड़फोड़ के वक्त निगम के बड़े अधिकारी खुद वहां मौजूद थे।
मामला पहुंचा गुजरात हाईकोर्ट; शेष मकानों पर रोक की मांग
इस बीच, बेघर हुए परिवारों के समर्थन में नासिरनगर के एक स्थानीय निवासी ने गुजरात हाईकोर्ट में एक दीवानी आवेदन और याचिका दायर कर इस अवैध तोड़फोड़ अभियान को तत्काल प्रभाव से चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि बिना किसी कानूनी प्रक्रिया और उचित नोटिस के इतने परिवारों को रातों-रात सड़कों पर लाकर उनके मौलिक अधिकारों का हनन किया गया है। याचिकाकर्ता, जिसका मकान अभी टूटने से बच गया है, ने कोर्ट से इस पूरे अभियान पर तुरंत अंतरिम रोक (Stay Order) लगाने और बेघर हुए लोगों के पुनर्वास व मुआवजे की गुहार लगाई है।

