कोट्टयम (केरल): देश के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने रविवार (31 मई 2026) को मीडिया और समाज में परोसी जा रही खबरों की गुणवत्ता को लेकर एक बेहद बड़ा और तीखा बयान दिया है। केरल के कोट्टयम में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यदि समाज में सकारात्मक समाचारों, रचनात्मक विचारों और देश की उपलब्धियों को प्रमुखता से नहीं दिखाया गया, तो नई पीढ़ी दिशाहीन हो जाएगी और सोशल मीडिया पर सक्रिय ‘कॉकरोच’ जैसे व्यंग्यात्मक व नकारात्मक तत्वों का अनुसरण करने लगेगी।
मलयालम अखबार के 140 साल पूरे होने के समारोह में पहुंचे उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन यहाँ एक प्रतिष्ठित मलयालम समाचार पत्र के गौरवशाली 140 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। पत्रकारिता के गिरते स्तर और सोशल मीडिया के दौर पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “समाज को सही दिशा देने, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने और आम जनता का भरोसा मजबूत करने के लिए रचनात्मक पत्रकारिता (Constructive Journalism) आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। मीडिया में सकारात्मक और प्रेरक घटनाओं को ज्यादा से ज्यादा जगह मिलनी चाहिए, ताकि देश के युवाओं को सही जानकारी और जीवन में आगे बढ़ने के लिए अच्छे रोल मॉडल मिल सकें।”
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और सोशल मीडिया ट्रेंड्स पर परोक्ष प्रहार
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन के दौरान हाल ही में युवाओं के बीच तेजी से वायरल हुए एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का अप्रत्यक्ष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह देश में अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन उन्हें इस बात पर गंभीर आपत्ति है कि आज के दौर में ऐसे निरर्थक मुद्दों को टीआरपी और व्यूज के लिए ज्यादा अहमियत दी जा रही है, जो लंबे समय तक प्रासंगिक भी नहीं रहते। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो चीजें अचानक बहुत बड़ी दिखती हैं, वे अक्सर टिकाऊ नहीं होतीं; जबकि कोई अच्छी बात या विचार एक हफ्ते, 10 दिन या एक महीने बाद भी समाज को याद रहता है।
क्या है ‘कॉकरोच’ विवाद की असल पृष्ठभूमि?
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद और व्यंग्यात्मक प्लेटफॉर्म पिछले दिनों देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के एक कथित बयान के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई थी। हालांकि, बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि उनके कानूनी बयान को संदर्भ से बाहर जाकर गलत तरीके से पेश किया गया था। उनका वास्तविक इशारा फर्जी, जाली और नकली डिग्रियों के सहारे वकालत के पेशे में घुसपैठ करने वाले भ्रष्ट तत्वों की ओर था। इसी विवाद की पृष्ठभूमि में उपराष्ट्रपति ने राष्ट्र निर्माण के लिए मीडिया से अच्छे और सकारात्मक संदेश समाज के हर हिस्से तक पहुंचाने की पुरजोर अपील की।

