ट्रिपल मर्डर केस में मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द, सजाएं एक साथ चलाने का दिया निर्देश
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सरकार, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से सजा बढ़ाने की औपचारिक अपील दायर नहीं की गई है, तो अपीलीय अदालत अपनी मर्जी से किसी दोषी की सजा में बढ़ोतरी नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने टिप्पणी की कि अपील करने के बाद दोषी को उस स्थिति से भी बदतर स्थिति में नहीं धकेला जा सकता, जिसमें वह अपनी अपील दायर करने से पहले था।
यह फैसला तमिलनाडु के बहुचर्चित ट्रिपल मर्डर केस में सह-दोषी गोपी की सजा को लेकर सुनाया गया है।
मद्रास हाईकोर्ट के फैसले में कानूनी त्रुटि शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने सह-दोषी गोपी की सामान्य उम्रकैद की सजा को बढ़ाकर ‘प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास’ में बदल दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि राज्य या पीड़ित पक्ष की ओर से सजा वृद्धि की कोई याचिका नहीं थी, ऐसे में हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर सजा बढ़ाना क्षेत्राधिकार का अनुचित उपयोग था। अदालत ने निर्देश दिया कि दोषी की विभिन्न सजाएं अलग-अलग चलने के बजाय एक साथ (Concurrently) चलेंगी।
उम्रकैद और ‘शेष जीवन तक जेल’ में बड़ा अंतर फैसले में दोनों सजाओं के तकनीकी अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा गया कि सामान्य उम्रकैद में 14 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद कानूनी नियमों के तहत समयपूर्व रिहाई या सजा माफी की संभावना बनी रहती है। वहीं ‘शेष जीवन तक कारावास’ में सजा में छूट या समयपूर्व रिहाई का विकल्प पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इसलिए बिना विधिवत कानूनी प्रक्रिया के सजा की प्रकृति को कठोर नहीं बनाया जा सकता।
क्या था बहुचर्चित ट्रिपल मर्डर केस? अभियोजन पक्ष के अनुसार, पूर्व कुलपति मलिक मोहम्मद के पूर्व ड्राइवर अंबरासु ने नौकरी से निकाले जाने के प्रतिशोध में अपने साथी गोपी के साथ मिलकर घर में घुसकर सुरक्षा गार्ड ज्ञानप्रकाशम और मोहम्मद की हत्या कर दी थी। इसके बाद दोनों आरोपी मोहम्मद की पत्नी कतीजा बीबी का अपहरण कर विलुप्पुरम के ओंगूर गांव ले गए और उन पर पेट्रोल-डीजल डालकर आग लगा दी थी। निचली अदालत ने मुख्य आरोपी अंबरासु को मृत्युदंड और गोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

