नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2026
पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच संघर्ष ने ब्रिक्स (BRICS) समूह के भीतर वैचारिक दरार पैदा कर दी है। पिछले हफ्ते नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के उप विदेश मंत्रियों और विशेष दूतों की बैठक में सदस्य देशों के अलग-अलग रुख के कारण किसी साझा घोषणापत्र या सामूहिक बयान पर सहमति नहीं बन पाई।
1. आम सहमति में बाधक रहे सदस्य देशों के रुख
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, बैठक में चर्चा तो व्यापक हुई लेकिन परिणाम शून्य रहा:
- ईरान की मांग: ब्रिक्स के नए सदस्य के रूप में ईरान चाहता था कि संगठन के मंच से अमेरिकी हमलों की कड़ी निंदा की जाए।
- यूएई (UAE) का रुख: संयुक्त अरब अमीरात के स्टैंड और अन्य सदस्य देशों के बीच संघर्ष को लेकर अलग-अलग आकलन के कारण कोई साझा दस्तावेज तैयार नहीं हो सका।
- अध्यक्ष का बयान: चूंकि आम सहमति (Consensus) नहीं बन पाई, इसलिए बैठक के अंत में केवल ‘अध्यक्ष का सारांश’ (Chair’s Statement) जारी किया गया, न कि कोई संयुक्त विज्ञप्ति।
2. भारत की कूटनीतिक परीक्षा और ‘दो-राष्ट्र’ समाधान
वर्तमान में ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। भारत ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट रखा है:
- स्थिरता: भारत ने ‘दो-राष्ट्र समाधान’ (Two-State Solution) के प्रति अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता दोहराई है।
- संतुलन: जनवरी 2026 में अरब लीग के साथ साझा रुख अपनाने के बाद, भारत ने ब्रिक्स के भीतर भी मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन सदस्य देशों के हितों के टकराव के कारण सफलता नहीं मिली।
3. भविष्य की चुनौतियां और आगामी सम्मेलन
ब्रिक्स के भीतर यह मतभेद आने वाले समय में संगठन की एकजुटता के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं:
- जून 2026: 14-15 जून को विदेश मंत्रियों का सम्मेलन प्रस्तावित है।
- सितंबर 2026: ब्रिक्स राष्ट्राध्यक्षों का शिखर सम्मेलन होना है।
- संकट का आर्थिक प्रभाव: पश्चिम एशिया में तनाव के कारण ईरान को अब तक 270 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ रहा है।

