लेह/लद्दाख, 30 मार्च 2026
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सोमवार को सशस्त्र बलों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि एक सैनिक को कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं होना चाहिए जहाँ उसे एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना पड़े—एक सीमा पर शत्रुओं से और दूसरी अपने कानूनी हक के लिए घर पर। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ‘माननीय मुख्य न्यायाधीश के संबोधन के मुख्य बिंदु’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि सैनिकों के लिए न्याय तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना केवल सहानुभूति का विषय नहीं, बल्कि एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, क्योंकि वर्दी पहनने से जीवन की सामान्य परेशानियां जैसे जमीन विवाद, पेंशन में देरी या प्रशासनिक उदासीनता खत्म नहीं हो जातीं।
हिमालय की दुर्गम वादियों में सैनिकों की बहादुरी को नमन करते हुए सीजेआई ने 1962 के रेजांग ला युद्ध और मेजर शैतान सिंह भाटी के सर्वोच्च बलिदान का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जहाँ अदालतें संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करती हैं, वहीं सैनिक उन परिस्थितियों को बनाए रखते हैं जिनसे ये आदर्श जीवित रह सकें। मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, कोई भी राष्ट्र स्वतंत्रता या न्याय की बात तब तक नहीं कर सकता जब तक उसकी संप्रभुता और स्थिरता सुरक्षित न हो। इस दृष्टि से न्यायपालिका और सेना के कार्य अलग-अलग होते हुए भी एक ही महान उद्देश्य के पूरक हैं।
सीजेआई ने अपने कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धि के रूप में ‘वीर परिवार सहायता योजना’ का जिक्र किया, जिसे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के तहत शुरू किया गया है। इस योजना के माध्यम से अब तक देश भर में 14,929 सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि इस मिशन को सफल बनाने के लिए 438 कानूनी सेवा केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें 1123 सदस्यों की टीम कार्यरत है, जिसमें 378 सदस्य स्वयं रक्षा पृष्ठभूमि से हैं। अंत में उन्होंने विश्वास दिलाया कि यदि सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, तो देश की संस्थाओं का यह परम कर्तव्य है कि वे उनके हितों की पूरी मजबूती से रक्षा करें।

