आमतौर पर यह माना जाता है कि अगर किसी व्यक्ति पर गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत मामला दर्ज हो जाए, तो उसका सालों तक जेल में रहना तय है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया ऐतिहासिक फैसले ने इस धारणा को बदल दिया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून चाहे कितना भी सख्त क्यों न हो, नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को दबाया नहीं जा सकता।
आइए इस केस स्टडी के जरिए समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह नया आदेश क्या है, इसके पीछे कौन से पुराने नियम और फैसले हैं, और आम नागरिक के लिए इसके क्या मायने हैं।
“केस स्टडी: सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम राज्य”, “नियम और कानूनी सिद्धांत” और “महत्वपूर्ण अदालती आदेश”
1. मामला क्या था?
सैयद इफ्तिखार अंद्राबी नाम का एक आरोपी पिछले 6 साल से जेल में बंद था। उस पर आरोप था कि उसने ड्रग्स की तस्करी (Narcotics Smuggling) के जरिए देश में ‘आतंकवाद’ को फंड (Terror Funding) किया। मामला बेहद गंभीर था और यूएपीए (UAPA) के तहत दर्ज था।
2. सुप्रीम कोर्ट की पीठ (Bench)
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की मानद जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने की।
3. कोर्ट का फैसला
सर्वोच्च अदालत ने अंद्राबी की जमानत (Bail) मंजूर करते हुए एक बहुत बड़ा कानूनी सिद्धांत दोहराया—“जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद” (Bail is a rule, Jail is an exception)। कोर्ट ने साफ किया कि यह नियम यूएपीए (UAPA) जैसे कड़े आतंकवाद विरोधी कानूनों पर भी लागू होता है।
नियम और कानूनी सिद्धांत: जिस पर कोर्ट ने दिया जोर
अधिकार-1: त्वरित सुनवाई का अधिकार (Right to Speedy Trial)
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को बिना दोषसिद्धि (बिना जुर्म साबित हुए) के सिर्फ इसलिए अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता क्योंकि जांच या कोर्ट का ट्रायल लंबा खिंच रहा है।
अधिकार-2: लंबे समय तक ट्रायल खिंचने पर जमानत का हक
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले का ट्रायल बहुत लंबा खिंच जाता है और उसमें अत्यधिक देरी होती है, तो आरोपी को उसके संवैधानिक अधिकारों के तहत जमानत पाने का पूरा हक है।
महत्वपूर्ण अदालती आदेश (Precedents) जिनका हवाला दिया गया
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को आधार देने के लिए अपने पुराने ऐतिहासिक निर्णयों का जिक्र किया और निचली अदालतों द्वारा उनका पालन न करने पर नाराजगी भी जताई:
1. यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब (2021) — मुख्य आधार
यह सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बड़ी बेंच का ऐतिहासिक फैसला है। इसमें कोर्ट ने पहली बार साफ किया था कि भले ही यूएपीए (UAPA) की धारा 43D(5) जमानत पर कड़ी शर्तें लगाती है, लेकिन यदि आरोपी लंबे समय से जेल में है और ट्रायल पूरा होने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही, तो अनुच्छेद 21 के तहत कोर्ट उसे जमानत दे सकता है। मौजूदा केस में इसी नियम को लागू किया गया।
2. ‘गुलफिशा फातिमा बनाम स्टेट’ मामले पर टिप्पणी
इस मामले के तहत पूर्व में उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इस पर मौजूदा पीठ ने टिप्पणी की कि गुलफिशा फातिमा मामले में जमानत न देने का फैसला, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच (केए नजीब मामला) के आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं करता था।
3. गुरविंदर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2024) पर नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2024 के इस फैसले पर भी असंतोष जताया, क्योंकि इस आदेश में भी ‘केए नजीब’ मामले के उदार सिद्धांतों और नियमों को नजरअंदाज कर दिया गया था।
इस फैसले का महत्व: आम जनता और कानून के लिए क्या बदलेगा?
- सालों तक बिना जुर्म साबित हुए जेल नहीं: इस फैसले से उन कैदियों को बड़ी राहत मिलेगी जो बिना अपराध साबित हुए सिर्फ ‘तारीख पर तारीख’ के कारण सालों से जेलों में सड़ रहे हैं।
- एजेंसियों पर दबाव: अब जांच एजेंसियों (जैसे NIA या पुलिस) पर यह दबाव रहेगा कि वे यूएपीए के मामलों में चार्जशीट दाखिल करने और ट्रायल को समय पर पूरा करने की प्रक्रिया को तेज करें।
- मानवाधिकारों की जीत: कड़े कानूनों की आड़ में किसी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी को अनिश्चितकाल के लिए नहीं छीना जा सकता, यह आदेश इस बात की पुष्टि करता है।
“कानून कितना भी सख्त क्यों न हो, वह देश के संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से बड़ा नहीं हो सकता।” — सुप्रीम कोर्ट की अहम सीख।

