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Thursday, July 2, 2026

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हिरासत में मौत (Custodial Death) मामले में ऐतिहासिक विधिक न्याय: महाराष्ट्र की अदालत ने 9 पुलिसकर्मियों को सुनाई उम्रकैद की सजा; 15 साल बाद आया फैसला

वाशिम (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के विधिक इतिहास में खाकी पर लगे दाग और हिरासत में यातना (Custodial Torture) के खिलाफ अदालत ने एक बेहद कड़ा और नजीर पेश करने वाला विधिक फैसला सुनाया है। वाशिम जिले की एक विशेष अदालत ने वर्ष 2011 के एक ‘हिरासत में मौत’ के मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी सहित नौ पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद (Life Imprisonment) की कठोर विधिक सजा सुनाई है।

वाशिम के जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जेपी झापटे ने गुरुवार (2 जुलाई 2026) को इस मामले पर अपना अंतिम विधिक निर्णय सुनाते हुए पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ कानून की सर्वोच्चता को स्थापित किया।

1. इन 9 पुलिसकर्मियों को मिली विधिक उम्रकैद की सजा

अदालत द्वारा दोषी पाए गए पुलिसकर्मियों में रिसोड थाने के तत्कालीन आला अधिकारी से लेकर कांस्टेबल स्तर के कर्मचारी शामिल हैं, जिन्हें विधिक हिरासत में लेकर तुरंत जेल भेज दिया गया:

  1. माधव धांडे (तत्कालीन थाना प्रभारी, रिसोड)
  2. मदन पवार
  3. शिवाजी खिल्लारी
  4. पंजाब पाटकर
  5. रमेश पवार
  6. प्रकाश तराम
  7. नागोराव खांडके
  8. अशोक वैद्य
  9. वसंत जाधव

2. क्या था पूरा विधिक मामला और यातना की कहानी?

यह पूरा आपराधिक और विधिक मामला पीड़ित भेग्या पवार की बर्बर मौत से जुड़ा हुआ है:

मामले की विधिक रूपरेखा⎩⎧​वर्ष 2011:यातना का आरोप:दर्दनाक मौत:​पुलिस ने भेग्या पवार को एक आपराधिक जांच के सिलसिले में वाशिम जिले के रिसोड थाने में विधिक रूप से हिरासत में लिया था।हिरासत के दौरान पुलिसकर्मियों ने विधिक सीमाओं को तोड़कर उनके साथ गंभीर मारपीट, अमानवीय व्यवहार और थर्ड-डिग्री टॉर्चर किया।थाने के भीतर ही अत्यधिक शारीरिक चोटों और आंतरिक रक्तस्राव के कारण भेग्या पवार की विधिक कस्टडी में ही मौत हो गई।​

परिजनों ने इसके खिलाफ कड़ा विधिक संघर्ष शुरू किया और आरोप लगाया कि यह सामान्य मौत नहीं बल्कि पुलिसिया तंत्र द्वारा की गई विधिक हत्या है।

3. महाराष्ट्र सीआईडी (CID) की पुख्ता जांच ने तय की सजा
मामले की संवेदनशीलता और मानवाधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए राज्य सरकार ने इस केस की विधिक जांच महाराष्ट्र अपराध जांच विभाग (State CID) को सौंप दी थी।
सीआईडी की विशेष विधिक टीम ने मामले की गहन तफ्तीश की और अदालत के समक्ष निम्नलिखित पुख्ता सबूत पेश किए:

  • मेडिकल रिपोर्ट: पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर मिले गहरे जख्म और यातना के अकाट्य विधिक साक्ष्य।
  • परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence): घटना के समय आरोपियों की थाने में उपस्थिति और लॉग-बुक के विधिक रिकॉर्ड।
  • गवाहों के बयान: स्वतंत्र गवाहों के बयानों ने पुलिस की झूठी थ्योरी को विधिक रूप से ध्वस्त कर दिया।

अदालत ने इन सभी वैज्ञानिक और विधिक साक्ष्यों को स्वीकार करते हुए सभी नौ पुलिसकर्मियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न प्रासंगिक विधिक धाराओं (जैसे धारा 302, 342, 34) के तहत दोषी माना। अदालत ने अपने ऐतिहासिक विधिक आदेश में स्पष्ट किया कि रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं, तो कानून उनके खिलाफ और अधिक कठोरता से काम करता है।

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